Bhagwan shiv parvati vivah

             भगवान शिव  पार्वती  विवाह

       नमस्कार दोस्तों,

भगवान शिव पार्वती विवाह वर्णन
भगवान शिव और पार्वती का विवाह  महाशिवरात्रि यानी फाल्गुन मास तेर्योदशी को जाना जाता है। भगवान शिव व माता पार्वती के विवाह की महिमा का गुणगान अनेकों रुप में पाया जाता है। कहा जाता है कि इनका विवाह बड़ा भव्य तरीके से सम्पन्न हुआ था परन्तु भगवान शिव के साथ कोई रिश्तेदार नहीं थे। त्रिलोक शिव अजन्मे  हैं। उनके विवाह में भूत बैताल चुडैंल पिशाच  सभी बाराती आये थे। शिव का एक रूप पशुपति भी है, इसीलिए सभी प्राणियों के देवता भी है। इनके बाराती में इसीलिए सभी  प्राणि  शामिल थे।
तपस्वी होने के कारण भगवान शिव को तनिक भी ज्ञान नहीं था कि दुल्हा विवाह के लिए किस तरह तैयार होता है। उनको भूत व पिशाच भस्म से सजा कर हडि्डयों का माला पहना दिया। बारात निकल  गई।
            
            जब ये अनोखी बारात दरवाजे पर पहुंची , तो सभी महिलाएं डर कर भाग गयीं। इस विचित्र रूप में भगवान शिव को माता पार्वती  की मां स्वीकार नहीं कीं।
भला कौन ऐसी मां होगी जो ऐसे भस्माधारी के साथ अपनी लाड़ली का हाथ सौंपेगी! स्थिति को बिगड़ते देख
पार्वती जी ने शिव जी से बिनती  की, हे  भोले नाथ! हमारे रीति रिवाज के अनुसार तैयार होकर पधारे। शिवजी ने उनकी विनती स्वीकार किया। सभी देवी-देवताओं को आदेश दिया। वो उन्हें सुन्दर ढंग से तैयार करें। पलभर में देवताओं ने भगवान शंकर को रेशमी  वस्त्र व फूलों से तैयार कर दिया। उनकी चमक चांद को भी मात देने लगी।


                जब भगवान शिव इस दिव्य रुप में पहुंचे तो
मां  मैना प्रसन्न हो गई और विवाह के लिए राजी हो गई।
भगवान शिव व माता पार्वती एक दूसरे को वरमाला डाले, और इस तरह माता पार्वती व शिव जी का विवाह सम्पन्न हुआ। 

विवाह स्थल  का वर्णन—-:

माना जाता है कि रुद्र प्रयाग स्थित एक(त्रियुगी नारायण  )स्थल  है, जहां सतयुग में भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था। यह पवित्र स्थान  हिमवत की राजधानी थी। इस पवित्र स्थान पर आज भी लोग संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगने आते हैं। आज भी यहां प्रत्येक वर्ष ५२द्वादशी के दिन सितंबर महीने में  यहां पर मेले का आयोजन होता है। श्रद्धालुओं के भक्ति भाव को मैंने एक छोटी सी कविता का रूप  देने की कोशिश किया है। अतः प्यार व आशीर्वाद अपेक्षित है:

                   कविता भक्ति भाव

जय शंकर जय जय भोले
बाजत डमरू लोक तीनों डोले।
सिर पर जटा गंगा विराजे
आधे चन्द्र जटा बीच साजे।

                     तन में भस्म भभूति लगाए
                     नील वर्ण नील कण्ठ कहाये।
                     ताण्डव करी जग पालन किन्हों
                     कटि लपेट मृगछाला लीन्हों।

शिव शम्भू महाकाल कहायें
श्मशान बीच धुनी रमाए।
तप करी जो नर दर्शन पावे
जनम मरण ताको छुट्टी जावे।

                     अबकी बारी हमारी  उबारो
                     हे भोले शिवशंकर तारो।
                     लाज बचालो हे  प्रभो मेरो
                     आन पड़ी मैं शरण में तेरो।
                 
                     धन्यवाद पाठकों
                     रचना-कृष्णावती

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