Aakhir jalal karne walo par jeet kaise payen आइए जानते है ईर्ष्या पर जीत कैसै पायें। ईर्ष्या मन में क्यों आती है।

Aakhir irshya par jeet kaise payen

Irshya ko kaise dur Karen
Aakhir jalas karnewalon par jeet kaise payen

 

दोस्तों आइए जानते है ईर्ष्या पर जीत कैसे पायें? साथियों ईर्ष्या एक मनुष्य की वृति है, ऐसी कमजोरी है जो प्रत्येक इंसान में थोड़ा बहुत होता ही है। दोस्तों आप ने  माचिस की तिल्ली को जलते देखा ही होगा। ठीक ऐसे ही इंसान खुद जलता है। फिर दुसरों को जलाता है।

दुनिया की जिस गति से उन्नति होनी चाहिए उस गति से नहीं  हो रही।धीमी गति से उन्नति हो रही है। इसका कारण वे सारे लोग है जो उन्नति के मार्ग का विरोध करते हैं।

ज्यादा तर लोग अपनी उन्नति चाहे या न चाहें परन्तु दुसरों की उन्नति ना हो आवश्य सोचते रहते हैं। इसी को ईर्ष्या कहते हैं। ऐसे लोग हमारे आस पास ही  होते हैं।  जहां हम काम करते है।

इतना ही नही अब अपनों में भी इस कलयुग में जरा सा मनमुटाव हो तो ईर्ष्या द्वेष पनप जा रही हैं। एक दूसरे की जान तक मार दी जा रही है। मां बाप को बेटा बेटी से ईर्ष्या, बेटा बेटी को मां बाप से ईर्ष्या,भाई भाई में ईर्ष्या सभी रिश्तों में स्वार्थ वश इर्ष्या पनप जा रही है ।

यहां तक की कोई भी रिस्ता ईर्ष्या से अछूता नहीं है। आज रिस्ते  इतने नाजुक होते जा रहें है कि इनकी बलि चढ़ते देर नही लगती।

ईर्ष्यालु व्यक्ति हमेशा दुसरों पर दबादबा बनाये रखता है। उसे डर रहता है कि कोई दुसरा उससे आगे ना निकल जाये। जिस प्रकार कमजोर मास्टर बच्चों को हमेशा पिटता है कि उससे कोई बच्चा सवाल ना पूछ ले।

Aakhir Jalas karnewalon par jeet kaise payen?

ईर्ष्यालु व्यक्ति सिर्फ अपने को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है। वह सिर्फ अपना भला चाहता है। वह किसी भी व्यक्ति को महत्व नहीं देता है। वह हमेशा दुसरों से अपना काम निकलवाना जानता है। काम निकलने के बाद वह व्यक्ति को महत्व नहीं देता है।

ईर्ष्यालु व्यक्ति  हमेशा दुसरों को आगे बढ़ने से रोकता है। तरह तरह की तरकीब रोकने के लिए सोचते रहता है। दुसरों की नाकामयाबी पर खुश होता  है । मेहनत करके आगे बढ़ने के बजाय लोगों को गिराकर आगे होना चाहता है।

वह सिर्फ दुसरों को आदेश देना जानता है। छोटी छोटी बातों पर दुसरों को सजा दिलवाना जानता है। कैसे किसी को जलील करें।डाट सुनवाये। सजा दिलवाये। यही सब सोचते रहता  है।

अब वे लोग जो अपने को अच्छा समझते है और प्रतिष्ठित पद पर विराजमान होते हैं, वे अच्छे तो होते है। परन्तु  भयानक स्वभाव वाले होते है। पता नहीं वो कब  भड़क जायें। उनके साथ रहना सबसे मुश्किल होता है। ऐसा सिर्फ उनके साथ रहनेवाले लोग ही जान पाते है।

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अब तक ईर्ष्यालु व्यक्ति का व्यवहार को हम जाने। अब हम जानेगे कि ईर्ष्या को  दूर कैसे करें?

 यदि आप आनंद के भाव से भरे हों तो आपके अंदर कभी ईर्ष्या नहीं होगी। इसीलिए मैं आनंद स्वरुप हूं। और भगवान आप आनंद के सागर है।इस शब्द को सदैव सुमिरन करते रहें। इस अभ्यास से हमारे संकपों से  अमृत पैदा होता है जो ईर्ष्या रुपी जहर को नष्ट कर देता है।

वास्तव में प्रत्येक  व्यक्ति  प्रेम और सम्मान चाहता है जितना ही यह दोनों गुण आपमें होंगे तो आपमें और किसी अन्य के प्रति ईर्ष्या नहीं उठेगी। नहीं आपसे कोई ईर्ष्या करेगा।

दूसरे की मदद करने से हमें जो संतुष्टि मिलती है,उससे ईर्ष्या का प्रभाव समाप्त हो जाता है।सभी व्यक्तियों की हृदय से सहायता करें। हृदय में सिर्फ सहयोग करना है  सोचने मात्र से भी उन्हें महसूस होगा। और वो जो चाहते हैं उन्हें मिल जाता है।

खुद में मस्त  हैं तो ईर्ष्या कभी आपके उपर हावी नहीं हो सकती।   दूसरा यदि आप  हनुमान चालीसा का पाठ किया करतें है तो निश्चित आप के मन से इर्ष्या निकल जायेगी।

for example – बजरंग वाण के अंतिम पंक्ति में यह लिखा हुआ है धूप देय अरू जपे हमेशा। ताके तन नहीं रहे कलेशा। 

नोट- यह अपने जीवन काल का कटु अनुभव है जो आप सभी के साथ शेयर किया गया है। हो सकता है आप सभी को यह अनुभव नहीं हुआ हो।

        धन्यवाद पाठकों,

         रचना-कृष्णावती

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