Jane Ek Tulsi Pata Se Satybhama Ka Ghamand Kaise Chur huwa?

Jane ek tulsi pata se ghamand kaise chur huwa
Jane ek tulsi pata se ghamand kaise Chur huwa

द्वारिका  महल में श्री कृष्ण जी जितने भी दिन थे, वहां उनसे सभी प्रेम करते थे। जहाँ भी रहते थे सभी लोग उनकी सेवा में लगे रहते थे। रूकमणि एवं सत्यभामा सहित  और सभी कृष्णजी के कार्य में लगे रहते थे।

उनमें सत्यभामा सबसे सुन्दर थीं। चूंकि वह राजा चित्रजीत की पुत्री थी। इसीलिए उन्हें अपने पिता के संपत्ति और अपनी सुन्दरता पर बहुत घमंड था। वह सदा कृष्णजी को अपने साथ ही रखना चाहती थी।

परन्तु रूकमणि कृष्ण की पहली पत्नी होते हुए भी बड़ा ही सरल और सहज थीं। वह हमेशा कृष्णजी के भक्ति भावना में लीन रहती थीं। परन्तु सत्यभामा सजने सवरने में और अपना रूूप निहारने में ही मगन रहती थीं।

एक दिन नारद जी कृष्णजी के महल में आ पहुंचे। वहां उनकी बगिया के फूलों को निहारती हुई सत्यभामा से भेंट हुई। नारद जी मिलते ही बोले रानी सत्यभामा को मेरा नमस्कार।

एक तुलसी जी के पता से सत्यभामा का घमंड कैसे चूर हुआ ?

रानी सत्यभामा ! कृष्णजी से सबसे अधिक कौन प्रेम करता है? आप या रानी रूकमणि? सत्यभामा ने कहा- यह आप क्या कह रहे हैं ? यह मैं नहीं कह रहा हूँ। द्वारिका की सारी जनता कह रही है कि, रूकमणि जी कृष्णजी से सबसे अधिक  प्रेम करती हैं।

लेकिन आप तो रूकमणि से अति सुन्दर है, आप अपनी सुन्दरता से कृष्णजी को अति प्रसन्न कर अपने वश में कर  सकती हैं । सत्यभामा ने कहा- यह सब कैसे संभव  हो सकता है नारदजी।

नारद जी ने कहा- एक उपाय है मेरे पास।सत्यभामा ने कहा- वह उपाय शीघ्र बतायें मुनीवर। तो ध्यान से सुनें छोटी रानी। एक व्रत है जिसमें अपने पति का दान करना होता है।

कृष्णजी के बराबर तौलकर सोना, मोल ब्राह्मण को दे दें । तत्पश्चात कृष्णजी को वापस ले लेना है। रानी सत्यभामा ने कहा- बस, इतना ही। अब आप  मुनीवर तैयार हो जाए।

मैं राजा छत्रजीत की बेटी हूँ। मेरे पिता जी के पास बहुत धन है। एक नहीं कई कृष्णजी को तराजू पर तौल सकती हूँ।  नारद जी मुस्कुराते हुए बोले-नारायण नारायण।

नारद जी मुस्कुराते हुए खड़े होकर देखने लगे।सत्यभामा एक नई नवेली दुल्हन जैसे सज कर तैयार हो गई।नगर के सभी लोग उस सभा में उपस्थित हो गये।  नगर से एक बड़े तराजू मंगाई गई।

एक तरफ कृष्णजी को बैठाया गया और दुसरे तरफ़ सत्यभामा हीरे मोती जवाहरात रखने लगी। तराजू का पलड़ा नहीं झूका। फिर दासी से ढेरों अन्दर से  जवाहरात हीरे मोती सोना चाँदी मंगवाती गई और रखतीं गई।

फिर भी कृष्णजी जिस पलड़े पर बैठे थे टस से मस नहीं हुआ। अंत में सत्यभामा ने अपने शरीर का जेवर भी पलड़े पर रख दिया। फिर भी कृष्णजी जिस पलड़े पर बैठे थे वह बराबर  नहीं हुआ। कृष्णजी के बराबर तौलकर सोना ब्राह्मण को यानि नारद जी को नहीं दे सकी। 

एक तुलसी पता से सत्यभामा का घमंड कैसे चूर हुआ?

यह देख कर नारदजी बोले- हे देवी! अगर मुझे  कृष्णजी के बराबर  धन नहीं मिला तो मैं आपके पति को बाजार में निलाम कर दूँगा। यानि कि मैं कृष्णजी को बाजार में बेच दूंगा। 

 तब सत्यभामा आश्चर्य चकित होकर बोलीं-

कुछ धोखा है राम दोहाई।। इतने भारी नहीं कन्हाई।।

नारद जी कहते – यह आपका सोना चाँदी जवाहरात सब नकली है। हमारा कृष्णा असली है।

उसके बाद नारद जी कृष्णजी को बाजार में निलाम करने के लिए लेकर जाने लगते हैं। यह देखकर सत्यभामा रोने लगती है और नारद जी से हाथ जोड़कर विनती करने लगती हैं।

हे  मुनीवर! आप मेरे श्याम को निलाम ना करें। मैं आपके पांव पड़ती हूँ।कृपया  आप मुझे बदनाम ना करें। उसके बाद सत्यभामा कहती हैं  हे मुनीवर ! अब आप ही कोई उपाय बतायें। तब नारद जी कहते हैं कि-

रूकमणि से तुम बात यह पूछो।। कैसे मिलेंगे कृष्ण यह पूछो।।

सत्यभामा रूकमणि के पास जाती हैं और कहतीं हैं – रूकमणि दीदी मुझे क्षमा कर दो और  कोई भी उपाय करके मुझे मेरा कृष्णजी वापस चाहिए। कृपया मेरे साथ चलो।

रूकमणि जी अपने साथ एक तुलसी जी का पता लेकर जाती है और भगवान कृष्ण जी का नाम लेकर तुलसी पता  पलड़े पर रख देेती हैं। सिर्फ एक तुलसी जी का पता ही कृष्णजी के  बराबर हो जाता है।अब सत्यभामा आश्चर्य से मौन होकर देखने लगतीं हैं ।

तभी कृष्णजी तराजू से उतरकर सत्यभामा के पास जाकर कहते हैं कि, हे देवी सत्यभामा  रूकमणि से  आप सीखें। रूकमणि ने श्रद्धा और भक्ति से एक तुलसी जी का पता रखकर मुझे प्रसन्न कर दिया। भगवान सुन्दरता से प्रसन्न नहीं होते, भाव से प्रसन्न होते हैं। 

हे देवी! आप के अंदर सिर्फ अपनी सुन्दरता और धन का घमंड था। इसीलिए तराजू का पलड़ा धन से बराबर नहीं हो पा रहा था । भगवान सिर्फ श्रद्धा और भक्ति से प्राप्त होते हैं,अभिमान से नहीं।

अंत में सत्यभामा नारद जी से हाथ जोड़कर कहती हैं कि हे मुनिवर आपको कोटि-कोटि धन्यवाद । आपने मेरी आँखे खोल दी।भगवान अभिमान से नहीं श्रद्धा से मिलते हैं।

       # जय श्री कृष्णा  # धन्यवाद दोस्तों 

         लेखिका – कृष्णावती कुमारी

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