Darindagi ki shikar ek aur Nirbhaya.

 कहने को आज हम सभी अपने को  शिक्षित मान रहे हैं। इसमे कोई शक नहीं, कि हम सभी शिक्षित नहीं हैं। साथियों समाज में सिर्फ किताबी ग्यान से ही मानसिकता  स्वच्छ नहीं होती।

मानसिकता को स्वच्छ करने के लिए  सबसे पहले शहर या गाँव की सभी मांओ को आगे आना होगा। अपनी संतानों को  सही गलत में फर्क बताना होगा। खासकर इस हैवानियत के विषय में साफ शब्दों में समझाना होगा। ताकि आगे से इस तरह की हैवानियत कोई ना कर सके।

दुसरी तरफ सरकार को ऐसा कानून लाना होगा, कि दरिन्दगी का ख्याल कोई सपने में भी, नहीं ला पाये। ख्याल आते ही रूह काप जाये । जब तक सरकार कोई कडा कदम नहीं उठाएगी तबतक इसी तरह बेटियों के,पहले आत्मा को मारा जायेगा, फिर जिस्म को नोच नोच कर रौंदा जाएगा?

आज फिर एक और निर्भया दरिन्दगी की शिकार हो गई। फिर वही कोट कचहरी। निर्भया को न्याय पाने में सात साल लग गए। इतना ही नही मुख्य अपराधी आज भी खुलेआम घूम रहा है जो बालिक होते हुए भी नाबालिग मान लिया गया।

 अब इस दुसरी निर्भया के दोषियों को सजा मिलने में न जाने कितने समय लगेगे?साथियों यह घटना सुनने के बाद मन बेकाबू होकर तडप रहा है।  जब जब दर्द बेशुमार होता है तब तब  लेखनी मनःस्थिति को चंद पंक्तियों में कागज के पन्नो पर उतार देती है।

साथियों आइए अब  नीचे मैने अपने दर्द को इस कविता के माध्यम से व्यक्त किया है जो निम्नवत है। आप सभी से आग्रह है कि त्रुटियोों  को नजर अंदाज करेेगे क्योंकि यह टाइपिंग है। गलतियाां संभवतः हो ही जाती है।

                  कविता

देश के महामहिम अब तो आंखे खोल दो।
कब तक मौन यूं रहोगे अब तो कुछ बोल दो।
कितनी निर्भया दरिन्दगी के आगोश में गई।
कितनी निर्भया हबस के बाद बलि चढ़ गई।

 

ऐ भारत  की नारियों जागो  बनो अब रणवीर।
अपने इन कोमल हाथों में चूडी नही, थामो अब शमशीर।
काट दो उन हाथों को जो तन तेरा छूता है।
निकाल लो उन आंखों को जो बूरी नजर से देखता है।

 

मचा दो हहाकार चारो तरफ, ऐसी समा जला दो आज।
जहाँ दरिन्दे नजर आए मिटा दो उन्हे तुम अपने हाथ। ।
अपनी रक्षा की खातिर तुम स्वयं रण में उतर जाओ।
दुर्गा काली रणचंडी बनना पड़े तो बन जाओ 

 

Darindagi ka shikar ek aur Nirbhaya 

 

चाहे गाँव हो या शहर ,अनगिनत बेटिया हबस बनी।
कितनो के तन काट दिए गये कितनी जला दी गई।
तेरी हैवानियत इतनी की इंसानियत शर्मशार हो गई।
आज बेबस मां फिर से लाचार हो गई।

 

सोचकर दिल दहल रहा है कितना दर्द दिया हैवान।
कैसे मर गया उसके भीतर का वो इंसान।
आज जलती हुई चिता भी चीख चीख कर कहती है।
मां मां नही छोड़ना इन दरिन्दो को यहीआवाज निकलतीहै।
दिन महीने साल कोट कचहरी में बीत जाये।
मां बाप और चाचा के तलवे तक घीस जाये।
बाग बगीचे खेत खलिहान बान्हे सब धराये।
गहना गुरिया सब जेवर सोनरा घर बिक जाये।
ऐसे कानूनन से थक गये भैया जो खुद ही बना लाचार।
अब परिवर्तन इसमें बिनती बा हमार।
ऐसी शख्त कानून निर्माण हो सुनकर काप उठे सैतान।
दूर कही कोई लड़की दिखे राह बदल जावे हैवान। 

दोस्तों तनिक भी हम सभी में इन्सानियत हो तो इस पोस्ट को गाँव गाँव तक पहुंचाये। ताकि इस मिजाज के हैवान हैवानियत से डरे। हर लड़की किसी की बेटी है।

किसी की मां होती है  किसी की बहन, किसी की पत्नी, किसी की भाभी किसी की चाची। एक बार स्वच्छ विचार से तो देखो।अरे दरिन्दो सभी रिस्ते को एक झटके में तार तार कर देते हो। सम्भल जाओ बहुत ही शीघ्र मेरी आवाज सच होगी।

जयssssssss  हिन्द!

        धन्यवाद साथियों 

रचना- कृष्णावती कुमारी 

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