Durga saptsati pratham aadhyay Hindi mein.

आइए दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय का महत्त्व हिन्दी अनुवाद के माध्यम से सहज भाषा में जानें I

देवी महात्म्य एक प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ है I साथियों देवी महात्म्य में मार्कण्डेय पुराण का अंश है I इसमें महिषासुर पर विजय का वर्णन किया गया है I

इसमें 700 श्लोक होने के कारण इसे दुर्गा सप्तशती के नाम से भी जाना जाता है I दुर्गा सप्तशती में संसार का समस्त  प्रतीकात्मक व्याख्या की गई है I हिन्दू धर्म में नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ सभी घरो में किया जाता है I तो आइये इसे महर्षि मार्कण्डेय जी के मुख से सुना जाय I

 Durga saptsati pratham aadhyay Hindi mein
durga saptsati pratham aadhyay Hindi mein

महर्षि मार्कण्डेय जी बोले– सूर्य के पुत्र सावर्णी के  उत्पति  की कथा विस्तार से आज मै सुनाता हूँ। 

सावर्णी आदि शक्ति महा माया के कृपा  से जिस प्रकार मनमनवंतर के स्वामी बने उसका हाल भी सुनो! पहले स्वरोसित नामक मनमनवंतर के चैत्र वंशी सुरथ नाम के एक राजा हुआ करते थे। जिनका पुरी पृथ्वी पर राज था।

वह अपनी प्रजा को पुत्र के सामान मानते थे। नीति के अनुसार राज्य करते हुए भी कोला विध्वंसी राजा उनके शत्रु बन गये। दुष्टो को दंड देने वाले राजा सुरथ की उनके साथ लड़ाई हो गई।

कोला विध्वंसियो की संख्या कम होते हुए भी राजा सुरथ की हार हो गई। तब वह अपने नगर में  आ गये। तत्पश्चात वे सिर्फ अपने ही देश के राजा रहे और राज करने लगे। परन्तु उनके शत्रु ने वहा भी उनके उपर आक्रमण कर दिया।

राजा को बलहीन तथा उदास देखकर उनके दुष्ट मंत्रियों ने राज्य की सेना और उनके खजाने पर अपना अधिकार कर लिया। तब राजा शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर घने जंगल में चले गये।

वहा वो महर्षि मेधा से मिले। महर्षि मेधा ने इज्जत से उनका सत्कार किया। महर्षि मेधा के आश्रम में रहते हुए राजा अपने राज्य मोह में सोच रहे थे कि जिस राज्य को मेरे पूर्वजो ने प्यार से पाला था,वह आज मुझसे छिन गया।

पता नही मेरे पूर्वजो की धरोहर दुष्ट मंत्रियों ने कैसे संभाल रहे  होगे। मेरे मदमस्त हाथी शत्रुओ के पास कैसा होगा। मेरे आग्यकारी नौकर जो मेरे शासनकाल मेें सदैव सुखी रहते थे।

अब वो निश्चय ही दुष्ट राजाओ के साथ दुख भोग रहे होोंगे। मेरे द्वारा संचय किया हुआ धन निश्चय ही दुष्ट मंत्री व्यय कर रहे होगे। इस तरह राजा दुखी रहने लगा। तभी राजा को आश्रम के पास एक मणिक खड़ा दिखाई दिया।

राजा ने मणिक से पूछा आप कौन है?   मणिक ने कहा-हे राजन मै धनियो के कुल मेें उत्पन्न एक वैश्य हूूं। धन के लोभी मेरे बच्चे और पत्नी मुझे घर से निकाल दिए है। फिर भी मुझे उनकी चिन्ता बहुत हो रही है।

मै कठोर नही हो पा रहा हू। हे राजन सब कुछ छिन जाने और मुझे त्यागने के बाद भी मेरा मन परिवार मे ही बसा है। समाधि नामक वणिक और राजा महर्षि मेधा के पास जाकर अपनी समस्या का विस्तार से वर्णन कर समाधान की इच्छा प्रकट किए।

तब महर्षि ने समाधान स्वरूप भगवान श्रीहरि द्वारा निर्मित महामाया है। ग्यान मोह और समझ इन पशु पक्षियो मेें भी होता है। जो अपने भूखे बच्चो के लिए चोच मेें दबाकर भोजन लाती है।हे राजन ऐसा प्रेम मनुष्यो मेें भी अपने संतान के प्रति होता है।

यह सच है कि मनुष्य में ग्यान अधिक है। यह माया ही है जो मनुष्य को जकड़े हुए है। पुरा संसार मोह माया मेें जकड़ा हुआ है।यही माया भगवती देवी ग्यानियो के चित को बल पूर्वक खीचकर माया मेें डाल देती है।

इसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत की उत्पति होती है। यही देवी संसार के बंधन का कारण हैैं। तो यहीीं  देवी मनुष्य को मुक्ति भी देतीीं है। यही देवी सभी देवताओं की स्वामिनी है I यहीं देवी संसार की रचयिता भी है I

य़ह सुनकर राजा सुरथ ने पूछा- हे भगवन! य़ह देवी कौन हैं? कृपया इनके विषय में विस्तार से बतायें I महर्षि मेधा ने कहाः तो हे राजन! सुनिए। यह देवी नित्य स्वरूपा है। जगत जननी है इनके सहस्त्रनाम है।

यह देवी देवताओ के कार्य को सिद्ध करने के लिए प्रकट होती है। तब यह उत्पन्न कहलाती है। हे राजन! संसार को जलमय करके भगवान विष्णु जब योग निद्रा का आश्रय लेकर शेष सैया पर सो रहे थे। तब उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुए और  ब्रह्म जी को मारने दौड़े।

Madhu kaitabh baddh
madhu kaitabh baddh

तब ब्रह्मजी चिन्तित होकर विष्णु जी को जगाने के लिए उनकी आंखो मेें निवास करने वाली योग निद्रा की स्तुती करने लगे। हे देवी! तुमही स्वाहा, तुमही स्वधा,और तुमही वषट्कार हो। स्वर भी तुमही हो, तुमही जीवन देनेवाली सुधा हो।

नित्य अक्षर प्रणव मे अकार उकार मकार इन तीनो माताओ के रूप मेें तुमही स्थित हो। इनके अतिरिक्त जो विन्दु पथ अर्ध माात्रा है, जिनका विशेष रूप से उच्चारण नही किया जा सकता वह भी  तुमही हो। संध्या सावित्री तथा परम जननी भी तुमही हो।

तुम इस विश्व को धारण करने वाली हो। तुमही इस जगत के पालनहार हो। हे देवी! जगत की उत्पति के समय तुमही श्रृष्टि रूपा होती हो। पालन काल मेें स्थित रूपा होती हो। कल्प के अंत मेें  सबका भक्शन करने वाली हो।

श्री ईश्वरी और बोध स्वरूपा बुद्धि भी तुमही हो। लज्जा पूष्टि बुद्धि शान्ति और क्षमा भी तुमही हो। तुम खड़ग धारिणी गदा चक्र शंख और धनुष  को धारण करने वाली हो।

बाण भुषंडि और परीधि यह भी तुमहारे ही अस्त्र है। तुम सौम्य और सौम्य तर हो। तुम सौम्य और सभी सुन्दरता में सर्वोपरि हो I पर और अपर सबसे परे  रहने वाली हो I हे माता सत्य और असत्य जो भी पदार्थ है उनमें जो भी शक्ति है वो सब तुम्हीं हो I

ऐसी अवस्था में भला तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है I संसार के सृष्टि संघार और पालन करने वाले जो भगवान है, जब तुमने उनको भी निद्रा के वशीभूत कर दिया है I तब फिर तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है I

 भगवान विष्णु और भगवान शंकर  को शरीर धारण कराने वाली भी तुम्ही हो I तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है? हे देवी तुम तो अपने उदार प्रभाव  के कारण ही प्रसंशनीय हो I मधु और कैटभ इन्हे तुम मोह में डाल दो।

हे माते श्री हरि को जल्दी ही जगा दो। उनमे मधु और कैटभ को मार डालने की बुद्धि भी उत्पन्न कर दो।  ब्रह्मजी की स्तुती सुनकर देवी माँ श्री हरि के सामने हृदय,  नेत्र,नाक, श्वास और वक्छ स्थल से निकलकर खड़ी हो गई।

उनके ऐसे करने पर भगवान श्रीहरि जाग उठे और अपने  समक्ष दोनो असुरो को देखा जो अत्यन्त  पराक्रमी थे और ब्रह्म जी को मारने के लिए  तैयार थे। यह देखकर श्री हरि अत्यन्त क्रोधित हुए और उन असुरो के साथ पांच हजार साल लडते रहे।

एक तो वह अत्यंत बलवान और पराक्रमी थे दुसरी तरफ  महामाया ने उन्हे मोह में  डाल रखा था।अतैव वह भगवान हरि से कहने लगे हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न है। मांग लो क्या वर माँगना चाहते हो?

श्री हरि बोले यदि तुम दोनो इतना ही प्रसन्न हो तो मुझे यह वरदान दो कि तुम दोनो मेरे हाथो से मारे जाओ। तथास्तु कहकर दोनो के चारो तरफ जल ही  जल दिखाई देने लगा।तब दोनो ने कहा हमारा बद्ध सुखे स्थान पर हो।

तब भगवान ने दोनो का सिर अपने जंघे पर रख कर बद्ध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्म जी की स्तुति करने पर माँ प्रकट हुई थी। प्रथम अध्याय यही समाप्त होता है।  जय मातादी। 

यह नोट-यह जानकारी नेट पत्रिक पूर्वजो द्वारा सुनी गई संग्रह किया गया है।

धन्यवाद- साथियो,

संग्र्हिता-कृष्णावती कुमारी 

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