Gilahari ne kaise prabhu Ram ki sahayta ki?

साथियो, जब सीता हरण हुआ था, तब रावण की नगरी से सीता जी को लाना आसान काम नहीं था। विशाल समुद्र को कैसे पार किया जाय रामजी अपने बानर सेना के साथ विचार कर रहे थे। तभी देवताओ के वास्तुकार विश्वकर्मा के पुत्र नल नील का जिक्र हुआ।

तत्पश्चात नल नील के नेतृत्व में बानर सेना श्रीराम और भैया लक्ष्मण के जयकारे के साथ पत्थरों के टुकड़े फेक फेक कर जय श्रीराम के उद्घघोष के साथ हिन्द महासागर पर पुल बनाने का काम अविलम्बता से शुरू किया गया। ताकि श्रीलंका से माता सीता को लाया जा सके। 

साथियो आइए जानते  है ( बालमीकि रामायण मे  एक उल्लेख मिलता है, एक महा काव्य जो भगवान विष्णु के सातवे अवतार की शानदार यात्रा का वर्णन करता है। रामसेतु का मतलब श्रीराम द्वारा बनाया गया पुल जोआज हम सभी राम सेतु के नाम से जानते है।

यह पुल श्रीलंका में मनार द्वीप के उतर पश्चिमी तट पर तमिलनाडु, भारत में पंबन द्वीप के सबसे दक्षिणी सिरे और तलिमन्नार के धनुष कोडी को जोड़ता है।)

Gilahari ne setupul mein kaise yogdan diya
gilahari ne kaise prabhu Ram ki sahayta ki

जब बानर सेना पुल के निर्माण में मगन होकर जय श्रीराम का जब जय घोष कर समुद्र में पत्थर डाल रहे थे, उसी बीच में  एक छोटी सी गिलहरी भी अपने मुह में छोटे छोटे पत्थर उठाकर डालती जा रही थी। परन्तु कुछ ही पल में  थक गई।

उसके बाद गिलहरी पत्थर डालना छोड़कर अपने मुह में बालू भर-भर कर समुद्र में डालने लगी।तभी कुछ बानर सेना के बीच में एक छोटी सी गिलहरी नजर आई। उनके पैरों तले गिलहरी आ जाती है।कुछ बानर वर्ग गिलहरी को उछाल कर अट्टहास करने लगे। यहां तुम क्या कर रही हो?

गिलहरी ने बोला- मैैं भी पुल बनने मेें मदद कर रही हूूं। यह सुनकर सभी बानर सेना जोर जोर से  हँसने लगी। हा हा हा हा। यहाँ बालू डालकर कैसे मदद करोगी  प्यारी गिलहरी ।

बानरो  की हँसी सुन कर बनवासी श्रीराम चंद्र जी की भी नजर उस गिलहरी पर पड़ी,तो कौतूहल वश उठकर गिलहरी के पास गये। नीचे झूक कर श्रीराम जी ने गिलहरी को अपने हाथों मेें उठा लिया। 

श्रीराम जी ने गिलहरी से उसके कार्य केे बारे मेें पूछा – गिलहरी ने जवाब दिया- हे प्रभो मैैं आपके इस महान कार्य  मेें अपनी छोटी सी भागीदारी तय कर पुण्य की भागीदारी बनना चााहती हूूं। गिलहरी के इस विचार को जानकर श्रीराम जी अति प्रसन्न हुए।

फिर क्या भगवान राम ने प्यार से गिलहरी को अपने हाथों मेें उठाकर अपने उंगलियोों से पीठ को स्नेह से सहलाने लगे। आज जो गिलहरी के पीठ पर सुन्दर सा निशान दिखता है वह भगवान राम के स्नेह भरा  उंगलियो का निशान है।

यह एक कििंवदन्ती है,आपने भी सुनी होगी। सीखने लायक बात यह है कि,महान कार्यों में यदि किसी का भी योगदान रंचमात्र का भी हो, तब भी उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा कर्तव्य है।

दोस्तों आपको बतादे कि कि विश्व भर मे अंजनी पुत्र के विभिन्न रूप मिल जायेगे। परन्तु गिलहरी रूप में यदि आपको दर्शन करना हो तो अलीगढ महानगर के अचल सरोवर स्थित प्राचीन गिलहराज मंदिर में इस रूप का दर्शन कर मनवांछित फल की प्राप्ति कर सकते है।

हनुमान जयन्ती के दिन देश विदेश से श्रद्धालू यहां गिलहराज के दर्शन हेतु प्रति वर्ष  आते है। दोस्तो यहा गिलहराज के दर्शन से नवगह भी शान्त होते है। साथियो ऐसे पवित्र  स्थल का जरूर दर्शन करें।

साथियो- धन्यवाद ,

संग्रहिता- कृष्णावती कुमारी 

 

Read more:https://www.krishnaofficial.co.in/

To buy now click on the link 

 

 

 

Share this post