Janen Vaishnav Mata ki kahani l

त्रेता युग में  पृथ्वी लोक पर कई सारी आसुरी शक्तियों का आतंक चारों ओर बढ़ गया था I यह देखकर त्रिदेव बहुत चिन्तित रहने लगे थे कि उनके द्वारा ही दिए गए वरदान पृथ्वी लोक पर आतंक का कारण बन गया है I

त्रिदेव को चिंतित देख तीनों देवियाँ महाकाली,लक्ष्मी और सरस्वती जी ने विचार किया कि वह त्रिदेवों के चिन्ता को दूर करेगी।तत्पश्चात तीनों देवियों ने अपनी आपार शक्तियों के तेज़ से एक सुन्दर सी बालिका को उत्पन्न किया I

वह बालिका प्रकट होते ही अपने जन्म का कारण पूछी। तब देवियों ने बताया कि आपके जन्म का कारण है पृथ्वी लोक पर आसुुरी शक्तियों का विनाश करना l आप जाएं दक्षिण भारत में रहने वाले विष्णु भक्त रत्नाकर के यहाँ जन्म ले I

वहीं दूसरी ओर सन्तान हिन रत्नाकर जब सो रहे थे तब विष्णु भगवान ने स्वप्न में रत्नाकर को बताया कि आपके घर एक कन्या जन्म होगा I जिसके भक्तों की संख्या अपरंपार होगी I

कुछ समय बाद रत्नाकर के घर एक पुत्री ने जन्म लिया I रत्नाकर ने पुत्री का नाम तृकुटा रखा I त्रिकूटा बचपन से ही दिव्य ज्ञान प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखती थीं I

शीघ्र ही त्रिकूटा को भान हो गया कि यह ज्ञान परिवार के बीच रहकर प्राप्त नहीं हो सकता है I तब त्रिकुटा ने  अपने पिता को यह बात बताई। अपने पिता से कहा- पिताजी मै घर त्याग कर समुद्र के किनारे तपस्या करना चाहती हूँ I

तब त्रिकुटा के पिता तैयार हो गए l उन्हें पता था कि उनकी बेटी कोई साधारण कन्या नहीं है Iबल्कि उसमे दिव्य ज्ञान समाहित है Iपिता के आग्या से  त्रिकूटा तपस्या के लिए समुद्र के किनारे चली गई।

एक दिन माता सीता की खोज में प्रभु श्री राम पर त्रिकूटा की नज़र पड़ी I वह तुरंत पहचान गई कि यह कोई और नहीं विष्णु के अवतार प्रभु श्री राम है I वह श्री राम के पास गई और भगवान राम से आग्रह किया कि वह अपने में उन्हें समाहित कर ले I

परंतु रामजी ने कहा कि यह समय उचित नहीं है I मैं तुम्हारी श्रद्धा से प्रसन्न हूं I इसीलिए आज से तुम्हारा नाम आज से वैष्णवी रहेगा I वनवास के पश्चात मैं तुम्हारे पास आऊंगा I

काफी समय बीत गया लेकिन  वैष्णवी का इंतजार प्रभु श्री राम के लिए समाप्त नहीं हुआ l तभी एक बुढ़ा व्यक्ति वैष्णो के सामने उपस्थित हो गया और बोला तुम अति सुन्दर हो और तुम्हारा इस तरह एकांत वन में रहना उचित नहीं है I

तुम मुझसे विवाह कर लो I वैश्णवी ने कहा चले जाओ मै पहले से ही प्रभु श्री राम की हो चुकी हूं I तभी वैष्णो को लगा कि मुझसे कुछ गलती हो गयी I जब तक वो कुछ कहती तब तक बहुत देर हो चुकी थी I

वैश्णवी ने क्षमा मांगी परंतु श्री रामजी ने कहा आपका मुझे पहचान न पाना य़ह दर्शाता है कि आपकी इच्छा पूर्ण करने का अभी उचित समय नहीं आया है Iअभी आपको धरती पर रह कर बहुत कार्य पूरा करना है I

Jane vainaav mata ki kahani
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त्रेता नहीं  बल्कि कलियुग में आप मेरे अंदर समाहित हो सकेगी,  जब मैं कल्कि अवतार लेकर कलियुग मेें जन्म लूँगा I तत्पश्चात प्रभु राम ने वैैष्णवी को निर्देश दिया कि आप उतर भारत की त्रिकुटा की पहाडियो में जाकर तपस्या करे।

वही अपना आश्रम स्थापित करे और अपनी तपस्या से लोगो का कल्याण करे। इसके पश्चात वैष्णवी ने तत्काल तपस्या के लिए प्रस्थान कर गई। वहा जाकर अपनी तपस्या प्रारंभ कर दिया।

धीरे धीरे समय बीतने  के बाद वैष्णवी की महिमा फैलते गई। परन्तु जब एक दिन महा योगी गोरखनाथ को वैैष्णवी के बारे मेेें यह पता  चला  तो उन्होंने तत्काल भैरवनाथ को बुलाकर वैष्णवी पर दृष्टि रखने को कहा।

आखिर उसमे ऐसा क्या है कि लोग भारी संख्या में उसके पास जा रहे है। भैरव वैष्णवी के उपर नजर रखने लगा। समय बीतने लगा  भैरव मन ही मन वैष्णवी की अलौकिक सुन्दरता पर मोहित हो गया।

एक दिन भैरवनाथ हिम्मत करके माता वैष्णवी से विवाह का प्रस्ताव रख दिया। परन्तु असफल रहा। वहा से माता वैष्णवी आगे बढ़ी।रास्ते में उन्हे प्यास लगी।तब वैष्णवी ने बाण से एक जल स्रोत का निर्माण किया और उससे अपनी प्यास बुझाई।

वर्तमान समय में इस स्थान को बाण गंगा के नाम से जाना जाता है।। तत्पश्चात वैष्णवी आगे बढ़ी जहाँ उन्हे एक गुफा के पास एक संयासी मिले। वैष्णवी ने महात्मा से कहा मैं इस गुफा में तपस्या करने जा रही हूँ।

हे महात्मा इस बारे मेें किसी को नही बतायेगे। गुफा में वैष्णवी ने नौ महिना तक तपस्या की। वर्तमान में इस गुफा को अर्थ कुवारी के नाम से जाना जाता है। भैरवनाथ माता को ढुढते ढुढते वहा पहुंच गया।

लेकिन गुफा के बाहर खड़े महात्मा ने भैरवनाथ को रोका और कहा-रूक जाओ। वह कोई साधारण स्त्री नही, साक्षात देवी का अवतार है। परन्तु भैरवनाथ नही माना। गुफा के अन्दर चला गया।

इस बार वैष्णवी के धैर्य का बाध टूट गया और वैष्णवी ने मां देवी का उग्र रूप लेकर भैरवनाथ का सिर धड़ से अलग कर दिया। तत्पश्चात भैरवनाथ को गलती का एहसास हुआ।

भैरवनाथ ने माता से क्षमा मांगी।तत्पश्चात माता ने आशीर्वाद दिया कि भविष्य में भक्तो को हमारे दर्शन के पश्चात भैरवनाथ का दर्शन करना अनिवार्य होगा। तभी उनकी यात्रा सफल होगी।

माता पुनः गुफा में चली गई और अपना मनुष्य रूप त्याग कर तीन मुख वाली पत्थर का रूप धारण कर लीं। माना जाता है कि यह तीन मुख महा काली, लक्ष्मी और सरस्वतीजी के रूप है। दोस्तों हमारा यह पोस्ट उम्मीद है अच्छी लगेगी।

          Mata rani vandana 

                 Mukhda

abki mandir nahin jaungi,

ghar ko mandir banwaungi.

mere ghar aana maiya,

abki ghar aana Ambe

 

  Antara

chahun or faila adhiyara,

sankat ka hai basera.

Bhay se jiyara thar thar kape,

shok dale hai dera.

Chandani gharhi tanwaungi.

Foolon se Mandir sajaungi.

Abki ghar aana ambey,

abki ghar aana maiya.

 

Bhakti bhav men kami na hogi,

tere charanon ki hu dasi.

tanmam arpan sada rahega,

tere nagar ki hun vasi.

Bas gun tera gaungi,

darshan tera chahungi.

Abki ……. 

mere ghar ………

धन्यवाद दोस्तों,

संग्रहिता- कृष्णावती कुमारी

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