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Kyon tutati hain Shadiya

Kyo tutati hain Shadiyan

Kyon tutatin hain Shadiya
Kyon tutatin hain shadiyan

आइए जानते हैं क्यों टूट रही हैंशादिया?

प्रश्न यह नहीं है कि क्यों टूट रही हैं ? प्रश्न यह है कि क्या कारण है कि शादिया टूट रही हैं ? शादी होने के बाद आखिर क्या वज़ह है कि कुछ महीने  बाद ही अन बन शुरू।
दोस्तों,हम  सभी जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहना हम सभी  पसंद करते है।  समाज की सोच से हम सभी अवगत रहते है। इसीलिए समाज से हटकर कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते है जिससे समाज हम पर उंगली उठाये ।
फिर भी समाज का कुछ वर्ग ऐसा है जो तकिया नुसी विचार धारा को अपना मान सम्मान बनाये बैठा है । दुसरी ओर शादी ब्याह को बहुत ही हल्के में लेकर खुद अभिभावक ही अपने औलादो की कुर्बानियां देने में पिछे नहीं है।
समाज का लगभग 80% माहौल बदल चुका है। सभी वर्ग लड़कों के साथ लडकियों को भी अपने सामर्थ्य के अनुसार शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के लिए भेज रहे हैं। अच्छे अंक से उतीर्ण होकर लड़कियां भी उच्च पद पर आसीन हो रहीं हैं।
परन्तु, आज भी समाज में अधिकतर परिवार के लड़कों की पढ़ाई फरेब और झूठ की नीव से हो रही है । लड़का घर के खरचे पर देश की राजधानियों में रह कर पढ़ता है । जाब भी करता है। उसकी पद इन्जीनियर डाक्टर से नीचे नहीं होती। अगर परिवार ऐसा नहीं करेगा तो कमाऊ लड़की जाल में कैसे फसेगी। 
लड़की वाले जब लड़के के घर जाते है,तो बड़ी बड़ी बातें लड़के का पिता करता है। तारीफ़ का ऐसा पूल बाधता है कि सीधे सादे लोगों को झांसे में फसने में तनिक भी देर नहीं लगती। लड़किया प्रतिष्ठित संस्थानों में आसीन है। पिता खुश होकर रिश्ता तय कर देते है कि योग्य वर मिल गया। 
शादी तय हो जाती है। यही से दोनों पक्ष यानि वर वधु पक्ष स्वयं रिस्ते में प्रथम दरार का समावेश करते हैं । शादी हो जाती है दुलहन ससुराल आती हैं। दिन सप्ताह माह बितता है। जब दुलहन को पता चलता है कि लड़का कुछ नहीं करता है।
तब उस लड़की के उपर क्या बितता है, उस लड़की से अधिक कोई नहीं समझ सकता। मानो लड़की के उपर  पहाड़ टूट कर गिर गया। लड़की को सम्भलना बड़ा मुश्किल होता है। मा बाप से भी नहीं कह पाती।
अब इधर सुघर पति अपने असली रूप में प्रकट होते है।   बेरोजगार होने के बावजूद, बीबी के उपर पति धौस जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। मर्द होने का अकड़ जो है।ब्रह्माजी ने बाहुबली जो बनाया है।  इधर नियति को मानकर लड़कियां रिश्ते को किसी तरह निभाते हुए कोल्हू के बैल की तरह खीच रही है।
विचारों का मतभेद होते हुए भी जीवन का डोर थामे समय काट रहीं हैं। घर से बाहर तक खट रही है। कब सुबह हुआ कब शाम। यह भी  पता नहीं  चलता।
ऐसे में पत्नी अगर अपनी कोई मन की बात रखती है तो जवाब में मिलता है। नौकरी का तुझे बहुत घमंड हो गया है। इतना ही नहीं कुछ पति तो ऐसे भी हैं जो पत्नी के पैसे पर राज करते हैं। पत्नी अपने मन का कुछ करना चाहे तो प्रतिबंध लगाने में तनिक भी कसर नहीं छोड़ते।
मेरे विचार में जहाँ यदि आप अपने मन से जी नहीं सकते, वहां बिल्कुल नहीं रहना चाहिए ।  एक कहावत मेरी माँ कहती थीं ।

”जहाँ आदर भाव स्वभाव नहीं, वो धरती के त्यागन करे के चाही। जवना नइहर में माई बाप नाही, वो नइहर के त्यागन करे के चाहि।।”

अर्थात,  जहाँ व्यक्ति को मान सम्मान न मिले उस स्थान पर बिल्कुल नहीं रहना चाहिए और जिस मैके में माता-पिता नहीं हो वहां भी नहीं जाना चाहिए। जिस पुरूष के नज़र में नारी का मान सम्मान न हो उस पुरूष से अलग ही रहना उचित है।
लडकियों के प्रति  ऐसे समाज के आचरण को देखते हुए प्रसून जोशी जी ने भी एक बहुत ही मारमिक गीत की रचना की है।  याद आ रही है जो निम्नवत है:-     

     गीत 

जिया मोरा घबराये  बाबुल, जिया मोरा घबराये।बिन बोले रहा ना जाए, बाबुल जिया मोरा घबराये••••••

 

बाबुल मोरी इतनी अरज सून लीजो ।
मोहे राजा घर ना दीजो- 2
मोहे राज पाठ ना भायो।
बाबुल जिया •••••••

 

बाबुल मोरी इतनी अरज सून लीजो
मोहे सोनार के घर ना दीजो -2
मोहे धन दौलत ना भायो
बाबुल जिया •••••••••।

 

बाबुल मोरी इतनी अरज सून लीजो
मोहे लोहार  के घर दे दीजो-2
जो मोरी जंजीरे पीघला दे।
बाबुल जिया ••••••••••।

 

इस गीत में बेटी अपने पिता से विनय पूर्वक कहती है कि, नहीं मुझे राजा जैसे राज पाठ चाहिए। नहीं मुझें सोनार जैसे धन दौलत चाहिए। मुझे तो पिताजी सिर्फ वैसा परिवार चाहिए   जहाँ मैं स्वतंत्र होकर सांस ले सकूँ ! 

दोस्तों,बेमेल शादियों का टूटना निश्चित है। इसीलिए शादी व्याह को जल्दी बाजी में नहीं करें। आज संसाधनों की कमी नहीं है। सही ढंग से पता लगाएँ। धोखेबाजो से सावधान।
नोट-यह धोखेबाजी यूपी बिहार के कुछेक सवर्ण परिवार में धड़ल्ले से हो रही हैं। ऐसे जालसाजो से अपनी लाढली को बचाये।उम्मीद है इस लेख से आप सभी सावधानी बरतेगें।

Kyon tutatin hain shadiyan
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धन्यवाद मेरे प्रिय पाठकों ,
लेखिका-कृष्णावती कुमारी
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